छोटानागपुर उन्नति समाज: आदिवासी सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अग्रदूत

The Chhotanagpur Unnati Samaj

छोटानागपुर उन्नति समाज, जिसे छोटानागपुर सुधार समिति के नाम से भी जाना जाता है, की स्थापना 1915 में एक दूरदर्शी उद्देश्य के साथ की गई थी — छोटानागपुर के आदिवासी समुदायों के उत्थान के लिए। यह संगठन आदिवासियों के लिए आशा की किरण बनकर उभरा, जिसने उनके अधिकारों की वकालत की, उनकी पहचान को संरक्षित रखा और सामाजिक-आर्थिक प्रगति को बढ़ावा दिया। छोटानागपुर की सांस्कृतिक धरती से जुड़ा यह समाज क्षेत्र के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा।


संस्थापक और प्रारंभिक दृष्टि

Jual Lakra

छोटानागपुर उन्नति समाज की स्थापना जुअल लकड़ा, पाल दयाल, बंदी राम उरांव और थेवले उरांव जैसे दूरदर्शी नेताओं ने की। इन नेताओं ने महसूस किया कि बढ़ते बाहरी दबावों के बीच आदिवासियों के अधिकारों और पहचान की रक्षा करना अत्यंत आवश्यक है।

संगठन के दो मुख्य उद्देश्य थे:
आदिवासी पहचान की रक्षा — ताकि उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान बाहरी प्रभावों से नष्ट न हो।
आदिवासी आकांक्षाओं की वकालत — ब्रिटिश प्रशासन और आदिवासी समुदायों के बीच सेतु बनकर उनकी समस्याओं और जरूरतों को सामने लाना।


गतिविधियाँ और प्रकाशन

छोटानागपुर उन्नति समाज की एक प्रमुख पहल आदिवासी” नामक पत्रिका का प्रकाशन था। यह पत्रिका अंग्रेज़ी, हिन्दी, कुड़ुख और मुंडारी भाषाओं में प्रकाशित होती थी, जिससे अधिकाधिक लोगों तक संदेश पहुँचे।

इस पत्रिका के माध्यम से:
• आदिवासी समस्याओं और चुनौतियों को उजागर किया गया
• लोक परंपराओं, लोककथाओं और सांस्कृतिक विरासत पर लेख प्रकाशित कर सांस्कृतिक पुनर्जागरण को बढ़ावा दिया गया
• राजनीतिक घटनाक्रम और उनके प्रभावों की जानकारी देकर आदिवासियों को जागरूक और सशक्त बनाया गया


साइमन कमीशन का विरोध

1928 में जब साइमन कमीशन पटना आया, तब छोटानागपुर उन्नति समाज ने उसका कड़ा विरोध किया। भारतीय प्रतिनिधित्व के बिना बने इस आयोग को भारत की स्वशासन की आकांक्षाओं का अपमान माना गया।

इस विरोध ने दिखाया कि:
• समाज भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के साथ खड़ा था
• वह यह सुनिश्चित करना चाहता था कि भारत के भविष्य की शासन व्यवस्था पर चर्चा में आदिवासी आवाजें भी शामिल हों


1930 के दशक में पुनर्गठन

1930 का दशक इस समाज के लिए परिवर्तन का काल था। जोएल लकड़ा के नेतृत्व में यह समाज केवल एक संगठन न रहकर एक आंदोलन का रूप लेने लगा।

मुख्य परिवर्तन:
• अधिक आदिवासी समुदायों की भागीदारी
• सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय जनभागीदारी
• भूमि हड़पने, आर्थिक शोषण और सामाजिक भेदभाव जैसे मुद्दों पर संगठित संघर्ष


वृहत्तर आदिवासी आंदोलन का हिस्सा

यह समाज अकेला नहीं था, बल्कि ताना आंदोलन और किसान सभा जैसे अन्य आंदोलनों के साथ मिलकर आदिवासी सशक्तिकरण और स्वतंत्रता संग्राम की व्यापक धारा का हिस्सा था।


समाज की विरासत

  1. आदिवासी पहचान का संरक्षण
  2. सामाजिक-आर्थिक प्रगति को बढ़ावा
  3. आदिवासी आवाज़ों को सशक्त बनाना
  4. भविष्य के आंदोलनों को प्रेरणा देना

समकालीन प्रासंगिकता

आज भी छोटानागपुर उन्नति समाज की कहानी सामुदायिक संगठन, सांस्कृतिक संरक्षण और जमीनी स्तर पर संघर्ष की प्रेरणा देती है।


झारखंड आंदोलन में भूमिका

छोटानागपुर उन्नति समाज ने झारखंड आंदोलन की नींव रखी। इसने छोटानागपुर पठार के आदिवासियों की पहचान, अधिकार और शासन की माँग को संगठित किया।

प्रमुख योगदान

• आदिवासी एकता को बढ़ावा
• “आदिवासी” पत्रिका के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना
• साइमन कमीशन का विरोध
• 1930 के दशक में आंदोलन के रूप में पुनर्गठन
• बाद के आंदोलनों जैसे झारखंड पार्टी (जयपाल सिंह मुंडा) को प्रेरणा


ऐतिहासिक महत्व

• छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (1908) के पालन की माँग
• सांस्कृतिक पुनर्जागरण
• आदिवासी मुद्दों का राजनीतिक विमर्श में प्रवेश
• झारखंड राज्य की माँग के लिए वैचारिक आधार


निष्कर्ष छोटानागपुर उन्नति समाज आदिवासी समुदायों के सामाजिक-राजनीतिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अग्रदूत था। इसने आदिवासी पहचान की रक्षा, अधिकारों की वकालत और स्वशासन की माँग को एक संगठित रूप दिया। इसकी विरासत आज भी झारखंड के इतिहास में एक आधारशिला के रूप में जीवित है।

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