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1. झारखंड का भू-राजनीतिक विकास और उपेक्षित विमर्श (Subaltern Narratives)
झारखंड का ऐतिहासिक प्रक्षेपवक्र ‘नृजातीय-क्षेत्रीय आत्मनिर्णय’ (Ethno-regional self-determination) और हेजेमोनिक नियंत्रण के विरुद्ध ‘सबाल्टर्न प्रतिरोध’ (Subaltern resistance) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। छोटानागपुर पठार के संसाधन-संपन्न क्षेत्र में स्थित यह ‘वन क्षेत्र’ ऐतिहासिक रूप से एक ‘सीमांत क्षेत्र’ (Frontier region) रहा है। यहाँ का इतिहास केवल राजाओं की वंशावली नहीं, बल्कि ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ (Internal Colonialism) की एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ क्षेत्रीय संसाधनों (खनिज और वन) और श्रम का दोहन बाहरी शक्तियों के लाभ के लिए किया गया, जिसका खामियाजा स्थानीय समुदायों को भुगतना पड़ा। यह विमर्श संसाधनों के दोहन और स्वदेशी अधिकारों के बीच के उस संरचनात्मक तनाव को उजागर करता है, जिसने अंततः 2000 ईस्वी में एक अलग राज्य की नींव रखी।
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- JPSC Prelims PYQ 2012–2024 Solved Paper (Hindi + English)

[झारखंड का भू-राजनीतिक मानचित्र – जो छोटानागपुर पठार की रणनीतिक स्थिति, प्रमुख खनिज क्षेत्रों और प्राचीन वन सीमाओं को दर्शाता हो, जिससे इसकी ‘सीमांत’ भौगोलिक स्थिति स्पष्ट हो सके।]
निष्कर्ष: यह विशिष्ट भू-राजनीतिक पहचान ही थी जिसने यहाँ के समुदायों में बाहरी हस्तक्षेप के विरुद्ध एक साझा प्रतिरोध की भावना पैदा की, जिसकी जड़ें प्राचीन स्वायत्त प्रणालियों में थीं।
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2. प्राचीन एवं मध्यकालीन काल: स्वायत्तता और प्रारंभिक राजवंश
झारखंड की भौगोलिक दुर्गमता और घने जंगलों ने इसे उत्तर भारत के बड़े साम्राज्यों के सीधे आत्मसातीकरण से बचाए रखा, जिससे यहाँ एक ‘तुलनात्मक स्वायत्तता’ विकसित हुई।
रणनीतिक महत्व और विकास:
- प्रारंभिक साक्ष्य: इटखोरी (चतरा) और डल्मी (धनबाद) जैसे स्थलों से प्राप्त ‘मेगालिथ’ (Megaliths), लौह अयस्क के अवशेष (Iron slag) और मिट्टी के बर्तनों (Pottery) के पुरातात्विक साक्ष्य यहाँ ताम्रपाषाण और लौह युगीन उन्नत धातुकर्म कौशल की पुष्टि करते हैं।
- पारंपरिक शासन व्यवस्था: मगध जैसे साम्राज्यों ने संसाधनों (हाथी, लोहा) के लिए इस क्षेत्र पर निर्भरता तो रखी, लेकिन यहाँ की कठिन स्थलाकृति ने मुंडा-मानकी और पड़हा पंचायत जैसी स्वदेशी सामाजिक-राजनीतिक संरचनाओं को अक्षुण्ण रखा। इन प्रणालियों ने जनजातीय स्वायत्तता को बाहरी साम्राज्यों के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच प्रदान किया।
- प्रमुख राजवंश:
- नागवंश: फणी मुकुट राय द्वारा स्थापित यह सबसे लंबा शासन करने वाला स्वदेशी राजवंश था। इन्होंने अपनी राजधानियाँ (सूतियाम्बे, चुटिया, डोइसा/नवरतनगढ़) रणनीतिक सुरक्षा के आधार पर बदलीं। उल्लेखनीय है कि नागवंशी राजा दुर्जन साल को मुगलों द्वारा कर न देने पर कैद किया गया, जिन्हें बाद में ‘शाह’ की उपाधि दी गई।
- चेरो राजवंश: पलामू क्षेत्र में मेदिनी राय (‘न्यायी राजा’) का शासन स्वर्ण युग माना जाता है, जिन्होंने मुगलों का डटकर मुकाबला किया और पलामू किलों का निर्माण कराया।
- सांस्कृतिक संगम: यह क्षेत्र जैन (पारसनाथ/शिखरजी) और बौद्ध धर्म (इटखोरी) के धार्मिक प्रसार का भी केंद्र रहा, जो यहाँ के व्यापारिक मार्गों के महत्व को दर्शाता है।
निष्कर्ष: मध्यकालीन युग की इस प्रशासनिक स्वायत्तता और स्थानीय राजवंशों के प्रतिरोध ने भविष्य के औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध ‘सबाल्टर्न एजेंसी’ की वैचारिक आधारभूमि तैयार की।
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3. औपनिवेशिक काल: संसाधन निष्कर्षण और जनजातीय विद्रोह (उलगुलान)
1771 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रवेश के साथ ही सीमित हस्तक्षेप का युग समाप्त होकर ‘सुनियोजित औपनिवेशिक प्रवेश’ का युग शुरू हुआ। 1793 के स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) ने पारंपरिक खूंटकट्टी (सामुदायिक स्वामित्व) व्यवस्था को नष्ट कर दिया, जिससे ‘दीकुओं’ (बाहरी जमींदार, साहूकार) का प्रभुत्व बढ़ा।
प्रमुख जनजातीय विद्रोह (विस्तृत तालिका):
| विद्रोह का नाम | वर्ष | नेतृत्व | मुख्य कारण | प्रशासनिक परिणाम |
| चुआर विद्रोह | 1771-1809 | जगन्नाथ ढाल, दुर्जन सिंह | भूमि राजस्व और जंगल महलों में हस्तक्षेप। | कड़े पुलिस नियमों का लागू होना। |
| तामार विद्रोह | 1789-1832 | उरांव, मुंडा, कोल | जमींदारों और अंग्रेजों के विरुद्ध लंबा संघर्ष। | सैन्य नियंत्रण में वृद्धि। |
| कोल विद्रोह | 1831-32 | बुद्धू भगत और अन्य | भूमि छीनने और दीकुओं के शोषण के विरुद्ध। | SWFA (1833) का गठन और विशेष नियम। |
| संथाल हुल | 1855-56 | सिधू, कान्हू, चाँद, भैरव | महाजनों और ब्रिटिश भ्रष्टाचार के विरुद्ध। | Santhal Parganas जिला और SPT Act 1876। |
| सरदारी लड़ाई | 1858-1895 | मुंडा व उरांव सरदार | पैतृक भूमि की वापसी के लिए कानूनी व हिंसक संघर्ष। | बिरसा आंदोलन की आधारभूमि तैयार हुई। |
| बिरसा उलगुलान | 1895-1900 | बिरसा मुंडा (‘धरती आबा’) | ‘मुंडा राज’ की स्थापना और सांस्कृतिक पुनरुद्धार। | CNT Act (1908) द्वारा भूमि सुरक्षा। |

[एक और भगवान बिरसा मुंडा का ओजस्वी चित्र और दूसरी ओर संथाल हूल के प्रतीकात्मक धनुष-बाण का रेखाचित्र, जो ‘दिक्कू’ और ब्रिटिश सेना के विरुद्ध संघर्ष के शौर्य को प्रदर्शित करता हो।]
निष्कर्ष: औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध हुए इन विद्रोहों ने बिखरी हुई जनजातीय चेतना को एक राजनीतिक पहचान में बदल दिया, जिसने आगे चलकर पृथक राज्य की मांग को जन्म दिया।
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4. पृथक राज्य की मांग का उदय (1915 – 1955)
20वीं सदी के प्रारंभ में संघर्ष ‘हथियारों’ से ‘संगठनों’ की ओर स्थानांतरित हो गया, जहाँ ईसाई मिशनरियों द्वारा प्रदान की गई शिक्षा ने जनजातीय चेतना को एक नया मंच दिया।
संस्थागत विकास:
- छोटानागपुर उन्नति समाज (1915): जोएल लाकड़ा के नेतृत्व में गठित इस निकाय ने पहली बार एक अलग प्रशासनिक इकाई की औपचारिक मांग की।
- आदिवासी महासभा (1939): जयपाल सिंह मुंडा ने इसे एक अखिल भारतीय पहचान दी। उन्होंने संविधान सभा में आदिवासियों के हितों को ‘आदिम राष्ट्र’ के रूप में प्रस्तुत किया।
- झारखंड पार्टी (1950): इसने चुनावी राजनीति में प्रवेश कर 1952 में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभाई।
राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) 1955 की विफलता: SRC ने भाषाई एकरूपता की कमी और आर्थिक व्यवहार्यता पर संदेह जताते हुए झारखंड राज्य की मांग को खारिज कर दिया। इस अस्वीकृति ने क्षेत्रीय असंतोष को और अधिक तीव्र कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि बिहार के अंतर्गत इस क्षेत्र का प्रशासनिक क्षरण जारी रहेगा।
निष्कर्ष: SRC की विफलता ने आंदोलनकारियों को यह सोचने पर मजबूर किया कि प्रशासनिक सुधारों के बजाय केवल राजनीतिक संप्रभुता ही इस ‘प्रशासनिकdecay’ को रोक सकती है।
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5. प्रशासनिक विकास का तुलनात्मक विश्लेषण
झारखंड क्षेत्र के प्रशासनिक परिवर्तनों को निम्नलिखित तालिका से समझा जा सकता है:
| तुलना के आधार | पूर्व-ब्रिटिश जनजातीय स्वायत्तता | ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन | स्वतंत्रता के बाद (बिहार के अंतर्गत) |
| प्रशासनिक संरचना | विकेंद्रीकृत (मुंडा-मानकी, पड़हा-पंचायत)। | अत्यधिक केंद्रीकृत; नॉन-रेगुलेशन प्रांतों का निर्माण। | पटना से संचालित केंद्रीकृत राज्य प्रशासन। |
| भूमि स्वामित्व | सामुदायिक स्वामित्व (खूंटकट्टी/भुईंहरी)। | जमींदारी प्रथा; बाद में सुरक्षा हेतु CNT/SPT एक्ट। | भूमि सुधार के नाम पर कानूनी जटिलताएँ। |
| संसाधन नियंत्रण | स्थानीय व सामुदायिक नियंत्रण। | साम्राज्यवादी लाभ के लिए वनों/खनिजों का दोहन। | राज्य का नियंत्रण; राजस्व साझाकरण में भेदभाव। |
| न्याय प्रणाली | पारंपरिक रूढ़िवादी न्याय व्यवस्था। | ब्रिटिश कानूनी संहिताएँ और जिला अदालतें। | एकीकृत भारतीय न्यायपालिका। |
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6. निरंतर संघर्ष के दशक और राज्य गठन (1970 – 2000)
1970 के दशक में आंदोलन ‘आर्थिक अभाव’ और ‘स्थानीय पहचान’ के नारों के साथ पुनर्जीवित हुआ।
प्रमुख मील के पत्थर:
- झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM – 1972): शिबू सोरेन और बिनोद बिहारी महतो ने ‘जल-जंगल-ज़मीन’ के साथ औद्योगिक मजदूरों को जोड़कर आंदोलन को व्यापक बनाया।
- JAAC (1995): झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद का गठन बिहार सरकार द्वारा एक ‘प्रशासनिक समझौते’ (Administrative Accommodation) के रूप में किया गया था। हालांकि, इसने पूर्ण राज्य की मांग को और हवा दी क्योंकि इसने 18 जिलों के प्रशासनिक अनुभव को पुख्ता किया।
- राज्य गठन: आंदोलन के बढ़ते दबाव और केंद्र में बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण ‘बिहार पुनर्गठन विधेयक, 2000’ पारित हुआ। 15 नवंबर 2000 को बिरसा मुंडा की जयंती पर ‘राजनीतिक संप्रभुता’ की प्राप्ति हुई।
निष्कर्ष: राज्य गठन एक सदी लंबे संघर्ष की परिणति थी, जो प्रशासनिक अधीनता से राजनीतिक स्वायत्तता की ओर संक्रमण का प्रतीक बना।
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7. आलोचनात्मक मूल्यांकन: अनसुलझे मुद्दे और भविष्य की चुनौतियाँ
राज्य गठन के 25 वर्षों बाद भी, ‘संसाधन अभिशाप’ (Resource Curse) की स्थिति बनी हुई है।
वर्तमान चुनौतियाँ:
- नियामक कब्जा (Regulatory Capture): खनिज संपदा का दोहन तो बढ़ा है, लेकिन ‘रेगुलेटरी कैप्चर’ के कारण लाभ स्थानीय समुदायों के बजाय बड़े कॉर्पोरेट और बिचौलियों तक सीमित रहा है।
- पर्यावरणीय क्षरण: अनियंत्रित खनन ने वादा किए गए आर्थिक लाभों के विपरीत भूमि और जल स्रोतों को गंभीर क्षति पहुँचाई है।
- कुपोषण और गरीबी: NFHS-5 के आंकड़े झारखंड में स्टंटिंग और वेस्टिंग की उच्च दरों को दर्शाते हैं, जो विकास के लाभों के असमान वितरण का प्रमाण है।
- नक्सलवाद और भूमि विस्थापन: विकास परियोजनाओं के नाम पर आज भी विस्थापन एक बड़ी समस्या है, जो नक्सली विचारधारा के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करती है।
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8. परीक्षा उपयोगी सामग्री (Exam Integration)
प्रारंभिक परीक्षा अभ्यास (MCQs):
- इटखोरी (चतरा) में प्राप्त प्राचीन साक्ष्यों का संबंध किस कालखंड से है?
- (A) केवल मध्यकालीन
- (B) लौह युग और मध्यकालीन
- (C) आधुनिक
- (D) इनमें से कोई नहीं उत्तर: (B) व्याख्या: यहाँ से लौह स्लैग और पाल कालीन बौद्ध अवशेष मिले हैं।
- किस अधिनियम ने मुंडाओं की ‘खूंटकट्टी’ व्यवस्था को वैधानिक सुरक्षा प्रदान की?
- (A) SPT एक्ट 1876
- (B) विल्किंसन रूल्स 1837
- (C) CNT एक्ट 1908
- (D) बिहार भूमि सुधार अधिनियम उत्तर: (C) व्याख्या: बिरसा उलगुलान के बाद 1908 में जनजातीय भूमि को गैर-जनजातीयों को हस्तांतरित करने से रोकने के लिए यह ‘महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा’ प्रदान की गई।
- झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद (JAAC, 1995) का मुख्य महत्व क्या था?
- (A) यह पूर्ण राज्य था।
- (B) यह प्रशासनिक स्वायत्तता की दिशा में एक ‘सीढ़ी’ (Stepping stone) था।
- (C) इसने जनजातीय विद्रोह को पूरी तरह समाप्त कर दिया।
- (D) यह एक निजी संगठन था। उत्तर: (B)
- 1955 में SRC द्वारा झारखंड राज्य की मांग खारिज करने का आधिकारिक कारण क्या था?
- (A) भाषाई एकरूपता का अभाव और आर्थिक व्यवहार्यता।
- (B) केवल नक्सलवाद।
- (C) धार्मिक कारण।
- (D) जनसंख्या की कमी। उत्तर: (A)
- मेदिनी राय, जिन्हें ‘न्यायी राजा’ कहा जाता है, किस राजवंश से संबंधित थे?
- (A) नागवंश
- (B) चेरो राजवंश
- (C) ढाल वंश
- (D) सिंह वंश उत्तर: (B)
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: “झारखंड राज्य का गठन केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि ‘आंतरिक उपनिवेशवाद’ और ‘संसाधन अभिशाप’ के विरुद्ध एक दीर्घकालिक सबाल्टर्न संघर्ष का परिणाम था।” वर्तमान चुनौतियों के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। (250 शब्द)
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Prepared by studyhelper.in | प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए श्रेष्ठ नोट्स
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