विल्किंसन नियम, 1837 : छोटानागपुर में शासन व्यवस्था
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन एक बड़ी चुनौती था। अंग्रेजों के सामने एक ओर प्राकृतिक संसाधनों के प्रभावी दोहन का लक्ष्य था, वहीं दूसरी ओर उन्हें आदिवासी समुदायों को नियंत्रित और शांत रखना भी आवश्यक था। यही ऐतिहासिक परिस्थिति आज के “सतत विकास” (Sustainable Development) और “विकास के साथ सामुदायिक अधिकारों के संतुलन” जैसी चर्चाओं को भी प्रभावित करती है।
छोटानागपुर क्षेत्र, जो प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध और जनजातीय समुदायों की मजबूत परंपराओं वाला क्षेत्र था, में यह संघर्ष 1837 के विल्किंसन नियमों (Wilkinson Rules) के रूप में सामने आया।
इन नियमों को “औपनिवेशिक प्रशासनिक संरक्षणवाद बनाम आदिवासी कानूनी स्वायत्तता” (Colonial Administrative Paternalism vs Indigenous Legal Autonomy) की अवधारणा के माध्यम से समझा जा सकता है। अंग्रेजी शासन ने एक ओर प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर व्यापक जनजातीय विरोध को कम करने के लिए कुछ पारंपरिक कानूनों और प्रथाओं को सीमित रूप में मान्यता भी दी।
ये नियम हो और मुंडा जनजातियों की भूमि तथा प्रशासनिक व्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण साबित हुए। बाद में छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (CNT Act) जैसे कानूनों पर भी इनका प्रभाव पड़ा।
UPSC में प्रासंगिकता (Relevance Snapshot)
GS-I : भारतीय इतिहास
- औपनिवेशिक प्रशासन और नीतियाँ
- जनजातीय नीतियाँ
- किसान एवं जनजातीय आंदोलन
- ब्रिटिश भारत की भूमि व्यवस्था
GS-II : शासन एवं सामाजिक न्याय
- पारंपरिक शासन व्यवस्था
- कानूनी बहुलवाद (Legal Pluralism)
- जनजातीय अधिकार
- अनुसूचित क्षेत्रों से जुड़े कानूनों का विकास (जैसे PESA Act, 1996)
GS-III : भूमि सुधार
- भूमि अधिकार और भूमि व्यवस्था का ऐतिहासिक विकास
- जनजातीय भूमि अधिकार
निबंध (Essay)
- उपनिवेशवाद
- आदिवासी अधिकार
- प्रशासनिक सुधार
- दीर्घकालिक सामाजिक प्रभाव
नियमों की उत्पत्ति और संस्थागत ढाँचा
विल्किंसन नियमों का जन्म छोटानागपुर क्षेत्र में बढ़ते किसान असंतोष और जनजातीय विद्रोहों की पृष्ठभूमि में हुआ। विशेष रूप से 1831-32 का कोल विद्रोह इसका प्रमुख कारण था।
यह विद्रोह मुख्यतः निम्न कारणों से हुआ:
- जनजातीय भूमि का हड़पना
- महाजनों (दिकुओं) द्वारा शोषण
- ब्रिटिश न्याय और राजस्व व्यवस्था द्वारा पारंपरिक कानूनों का कमजोर होना
इस विद्रोह ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था जनजातीय क्षेत्रों में प्रभावी नहीं थी।
स्थिति को नियंत्रित करने और भविष्य में विद्रोह रोकने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1833 में Regulation XIII लागू किया। इसके अंतर्गत इस क्षेत्र को “South West Frontier Agency (SWFA)” में परिवर्तित कर दिया गया।
इसके बाद 1837 में कैप्टन थॉमस विल्किंसन, जो दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी के राजनीतिक प्रतिनिधि थे, ने मुख्यतः हो जनजाति वाले कोल्हान क्षेत्र के लिए विल्किंसन नियम बनाए।
प्रमुख पृष्ठभूमि (Key Antecedents)
कोल विद्रोह (1831-32)
- यह एक बड़ा जनजातीय विद्रोह था।
- कारण: भूमि हड़पना, शोषण और विदेशी कानूनों का थोपना।
- परिणाम: भारी जनहानि और संपत्ति का नुकसान।
Regulation XIII, 1833
- छोटानागपुर के कई जनजातीय क्षेत्रों में पुरानी न्यायिक और राजस्व व्यवस्था समाप्त की गई।
- South West Frontier Agency (SWFA) की स्थापना की गई।
- इसका उद्देश्य स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अधिक लचीला प्रशासन देना था।
पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था की असफलता
- ब्रिटिश न्याय व्यवस्था जटिल और जनजातीय समाज के लिए अपरिचित थी।
- गैर-जनजातीय अधिकारियों द्वारा न्याय देने से असंतोष बढ़ा।
- विवादों का समाधान प्रभावी ढंग से नहीं हो पा रहा था, जिससे विद्रोह और बढ़े।
नियमों के अंतर्गत संस्थागत संरचना
राजनीतिक एजेंट (कैप्टन थॉमस विल्किंसन)
कोल्हान क्षेत्र में सर्वोच्च कार्यकारी, दीवानी और आपराधिक अधिकार राजनीतिक एजेंट के पास थे। वह सीधे गवर्नर-जनरल इन काउंसिल के अधीन कार्य करता था।
मुंडा (गाँव का मुखिया)
मुंडा को गाँव स्तर पर मुख्य प्रशासनिक और न्यायिक अधिकारी के रूप में मान्यता दी गई थी। उसकी जिम्मेदारियाँ थीं:
- राजस्व संग्रह करना
- कानून और व्यवस्था बनाए रखना
- छोटे विवादों का निपटारा करना
मानकी (गाँवों के समूह/पीर का प्रमुख)
मानकी, मुंडा और राजनीतिक एजेंट के बीच मध्यस्थ के रूप में कार्य करता था। उसकी जिम्मेदारियाँ थीं:
- कई मुंडाओं की निगरानी करना
- अपने पीर (गाँव समूह) से राजस्व एकत्र करना
- बड़े विवादों का निपटारा करना
परगनैत (गैर-हो क्षेत्रों में)
कोल्हान क्षेत्र के बाहर लेकिन दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी (SWFA) के अंतर्गत समान प्रकार के पद स्थापित किए गए, जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता था। इनका कार्य राजस्व और न्याय व्यवस्था को संभालना था।
प्रथागत कानून (Customary Law)
नियमों में स्पष्ट रूप से कहा गया कि दीवानी और छोटे आपराधिक मामलों का निर्णय हो समुदाय की परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार किया जाएगा। इस प्रकार सीमित कानूनी बहुलवाद (Legal Pluralism) को औपचारिक मान्यता दी गई।
मुख्य प्रावधान और कार्यप्रणाली
विल्किंसन नियमों का उद्देश्य कोल्हान क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुरूप एक विशेष प्रशासनिक और भूमि राजस्व व्यवस्था विकसित करना था। इस व्यवस्था के माध्यम से अंग्रेजों ने जनजातीय नेतृत्व को अपने प्रशासन से जोड़ते हुए नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। साथ ही, जनजातीय भूमि अधिकारों की रक्षा और नियमित राजस्व प्राप्त करना भी इसका उद्देश्य था।
भूमि राजस्व व्यवस्था
निश्चित कर निर्धारण (Fixed Assessment)
राजस्व का निर्धारण व्यक्तिगत भूमि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रति हल या प्रति गाँव के आधार पर किया जाता था। यह पारंपरिक सामूहिक जिम्मेदारी की व्यवस्था से मेल खाता था।
मुंडा की भूमिका
मुंडा अपने गाँव से राजस्व एकत्र कर मानकी को देता था।
मानकी की भूमिका
मानकी अपने पीर के मुंडाओं से राजस्व एकत्र कर राजनीतिक एजेंट को सौंपता था।
भूमि हस्तांतरण निषेध (Non-Alienation Clause)
एक महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि हो समुदाय की भूमि को किसी गैर-हो व्यक्ति को राजनीतिक एजेंट की अनुमति के बिना बेचा या गिरवी नहीं रखा जा सकता था। इसका उद्देश्य भूमि हड़पने को रोकना था।
न्याय व्यवस्था
प्रथागत कानून
दीवानी और छोटे आपराधिक मामलों में हो समुदाय के पारंपरिक कानूनों को औपचारिक मान्यता दी गई।
स्तरीय न्याय व्यवस्था (Tiered System)
- मुंडा छोटे मामलों का निपटारा करता था।
- मानकी अपील और गंभीर मामलों की सुनवाई करता था।
- राजनीतिक एजेंट अंतिम अपीलीय प्राधिकारी था तथा हत्या और डकैती जैसे गंभीर अपराधों पर उसका सीधा अधिकार था।
जूरी प्रणाली (अनौपचारिक)
मानकी न्यायालयों में गाँव के बुजुर्गों को भी शामिल किया जाता था, जिससे समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित होती थी।
प्रशासनिक कार्य
शांति और व्यवस्था
मुंडा और मानकी कानून-व्यवस्था बनाए रखने, अपराधियों को पकड़ने और महत्वपूर्ण घटनाओं की सूचना राजनीतिक एजेंट को देने के लिए जिम्मेदार थे।
आधारभूत संरचना
वे स्थानीय सार्वजनिक कार्यों और सामुदायिक कल्याण से जुड़े कार्यों में भी भाग लेते थे।
आलोचनात्मक मूल्यांकन और सीमाएँ
यद्यपि विल्किंसन नियमों को अक्सर जनजातीय समुदायों के लिए एक “सुरक्षात्मक” व्यवस्था माना जाता है, लेकिन वास्तव में ये मुख्यतः ब्रिटिश औपनिवेशिक प्रशासन का एक साधन थे।
ये नियम प्रत्यक्ष शासन के बजाय अप्रत्यक्ष शासन (Indirect Rule) की ओर एक व्यावहारिक बदलाव को दर्शाते हैं। अंग्रेजों ने जनजातीय संस्थाओं और परंपराओं को इसलिए मान्यता दी ताकि वे विद्रोहों को शांत कर सकें और राजस्व प्रशासन को अधिक प्रभावी बना सकें, न कि वास्तविक स्वशासन स्थापित करने के उद्देश्य से।
आंतरिक विरोधाभास (Inherent Contradictions)
प्रथागत कानूनों (Customary Laws) की मान्यता काफी हद तक औपचारिक थी। अंतिम अधिकार राजनीतिक एजेंट के पास था, जिसके कारण पारंपरिक कानूनों को कभी भी बदला या औपनिवेशिक दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया जा सकता था।
इन नियमों का मुख्य उद्देश्य आगे होने वाले विद्रोहों को रोकना था, न कि वास्तविक जनजातीय विकास को बढ़ावा देना।
यह संरक्षणवादी (Paternalistic) दृष्टिकोण स्थिरता तो चाहता था, लेकिन व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास की आवश्यकता को नजरअंदाज करता था। यही चुनौती आज भी भारत की पोषण सुरक्षा और समावेशी विकास संबंधी नीतियों में दिखाई देती है।
संरक्षणवादी नियंत्रण (Paternalistic Control)
यह व्यवस्था अत्यधिक संरक्षणवादी थी। अंग्रेज जनजातीय समुदायों को “पिछड़ा” मानते थे और उन्हें बाहरी शोषण से बचाने की बात करते थे, लेकिन साथ ही उन्हें ब्रिटिश नियंत्रण के अधीन भी रखते थे।
इससे जनजातीय समुदायों की राजनीतिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की क्षमता सीमित हो गई।
अन्य जनजातियों की उपेक्षा
विल्किंसन नियम मुख्यतः कोल्हान क्षेत्र की हो जनजाति के लिए लागू किए गए थे।
इसके कारण छोटानागपुर की अन्य जनजातियाँ, जैसे — मुंडा और उरांव, अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं और समस्याओं का सामना करती रहीं। इससे असमानता और असंतोष की स्थिति उत्पन्न हुई।
राँची जैसे प्रमुख क्षेत्रों का इतिहास भी इन प्रशासनिक परिवर्तनों और उनके प्रभावों को दर्शाता है।
भविष्य के संघर्षों के बीज
भूमि हस्तांतरण रोकने के प्रावधानों के बावजूद भूमि हड़पना पूरी तरह बंद नहीं हुआ।
यह प्रक्रिया अधिक छिपे हुए तरीकों से जारी रही, विशेषकर कोल्हान क्षेत्र के बाहर।
मुंडा-मानकी व्यवस्था को औपचारिक रूप देने से प्रारंभ में स्थिरता आई, लेकिन बाद में यही व्यवस्था आंतरिक शक्ति संघर्ष और भ्रष्टाचार का कारण भी बनी, क्योंकि ये नेता औपनिवेशिक प्रशासन के प्रतिनिधि बन गए थे।
सीमित आर्थिक विकास
ब्रिटिश प्रशासन का मुख्य ध्यान केवल भूमि राजस्व और कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर था।
शिक्षा, स्वास्थ्य और व्यापक सामाजिक-आर्थिक विकास की ओर बहुत कम ध्यान दिया गया, जिसके कारण क्षेत्र लंबे समय तक अविकसित बना रहा।
तुलनात्मक दृष्टिकोण : शासन व्यवस्था
विल्किंसन नियम सामान्य ब्रिटिश प्रशासन से अलग एक विशेष शासन पद्धति का उदाहरण थे।
यह ब्रिटिश नीति “भिन्न शासन व्यवस्था” (Differentiated Governance) को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत अंग्रेज उन क्षेत्रों के लिए अलग प्रशासनिक प्रणाली अपनाते थे जिन्हें वे “पिछड़ा” या “अशांत” मानते थे।
| पहलू | विल्किंसन नियमों से पूर्व का काल (19वीं शताब्दी का प्रारंभिक छोटानागपुर) | विल्किंसन नियम, 1837 (कोल्हान क्षेत्र) | सामान्य ब्रिटिश प्रशासन (जैसे बंगाल प्रेसीडेंसी) |
|---|---|---|---|
| मुख्य उद्देश्य | अधिकतम राजस्व प्राप्त करना, जनजातीय कानूनों की कम समझ | शांति स्थापित करना, राजस्व संग्रह, हो जनजाति की भूमि को बाहरी हस्तांतरण से बचाना | अधिकतम राजस्व प्राप्त करना तथा एक समान प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था स्थापित करना |
| भूमि व्यवस्था | सामुदायिक भूमि स्वामित्व, overlapping claims, जमींदारी व्यवस्था की शुरुआत | मुंडा-मानकी भूमि व्यवस्था को औपचारिक मान्यता, भूमि हस्तांतरण निषेध प्रावधान | जमींदारी व्यवस्था, व्यक्तिगत भूमि स्वामित्व, स्थायी बंदोबस्त |
| न्याय व्यवस्था | पारंपरिक जनजातीय न्याय प्रणाली, अस्थायी ब्रिटिश न्यायालय | स्तरीय व्यवस्था (मुंडा, मानकी, राजनीतिक एजेंट), प्रथागत कानूनों की मान्यता | नियमित ब्रिटिश न्यायालय, भारतीय दंड संहिता (IPC), दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) |
| प्रशासनिक संरचना | कमजोर ब्रिटिश नियंत्रण, स्थानीय जमींदारों/ठीकदारों पर निर्भरता | मुंडा-मानकी के माध्यम से अप्रत्यक्ष शासन, राजनीतिक एजेंट की प्रत्यक्ष निगरानी | केंद्रीकृत नौकरशाही (कलेक्टर, मजिस्ट्रेट), संहिताबद्ध कानून |
| कानूनी आधार | 1793 का Regulation X और सामान्य कानून | 1833 का Regulation XIII तथा राजनीतिक एजेंट द्वारा बनाए गए विशेष नियम | गवर्नर-जनरल के नियम तथा बाद में संसद के अधिनियम |
| जनजातीय स्वायत्तता पर प्रभाव | जमींदारी और बाहरी कानूनों के कारण स्वायत्तता का ह्रास | औपनिवेशिक निगरानी के अधीन सीमित स्वायत्तता का संरक्षण | स्वायत्तता में भारी कमी, मुख्यधारा प्रशासन में एकीकरण |
विरासत और स्थायी प्रभाव
विल्किंसन नियमों ने छोटानागपुर, विशेष रूप से कोल्हान क्षेत्र की शासन व्यवस्था और भूमि संबंधों पर गहरा प्रभाव डाला। इन्हें बाद में जनजातीय क्षेत्रों के लिए बनाए गए सुरक्षात्मक कानूनों का प्रारंभिक आधार माना जाता है।
बाद के कानूनों का आधार
जनजातीय भूमि को बाहरी लोगों के हाथों जाने से बचाने तथा पारंपरिक मुखियाओं को मान्यता देने के सिद्धांतों ने छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (CNT Act), 1908 को प्रभावित किया।
इस कानून ने संशोधित रूप में पूरे छोटानागपुर क्षेत्र में समान सुरक्षा प्रदान की।
पारंपरिक व्यवस्थाओं की निरंतरता
मुंडा-मानकी व्यवस्था, जिसे विल्किंसन नियमों ने वैधता प्रदान की थी, आज भी कोल्हान क्षेत्र के स्थानीय प्रशासन में किसी न किसी रूप में मौजूद है।
यह “कानूनी निरंतरता और अनुकूलन” (Legal Continuity and Adaptation) का उदाहरण माना जाता है।
पहचान और प्रतिरोध का स्रोत
यद्यपि ये नियम औपनिवेशिक शासन द्वारा बनाए गए थे, फिर भी वे हो जनजाति की सामूहिक स्मृति और पहचान का हिस्सा बन गए।
बाद के समय में भूमि अधिकारों और अधिक स्वायत्तता की मांगों में इन नियमों का उल्लेख किया जाता रहा।
प्रशासनिक उदाहरण (Administrative Precedent)
“अनुसूचित क्षेत्र” (Scheduled Areas) की अवधारणा तथा 1996 का PESA Act, जो जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने का प्रयास करता है, आधुनिक समय में उन्हीं समस्याओं का समाधान खोजने का प्रयास माना जा सकता है जिनसे विल्किंसन नियम आंशिक रूप से जुड़े थे।
जनजातीय भूमि अधिकारों की रक्षा का यह प्रयास संथाल परगना टेनेंसी एक्ट, 1949 जैसे कानूनों में भी दिखाई देता है।
संरचित मूल्यांकन (Structured Assessment)
नीतिगत पर्याप्तता (Policy Design Adequacy)
विल्किंसन नियम एक व्यावहारिक, यद्यपि संरक्षणवादी (Paternalistic), नीति व्यवस्था थे, जिन्हें विशेष रूप से जनजातीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाया गया था।
इनकी मिश्रित व्यवस्था, जिसमें अप्रत्यक्ष शासन (Indirect Rule) के साथ प्रथागत कानूनों और पारंपरिक नेतृत्व को औपचारिक मान्यता दी गई, तत्काल विद्रोहों को शांत करने और ब्रिटिश प्रशासन को स्थिर करने में प्रभावी साबित हुई।
इस व्यवस्था ने जनजातीय समुदायों की अलग शासन व्यवस्था की अपेक्षाओं को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
शासन एवं संस्थागत क्षमता (Governance / Institutional Capacity)
इस व्यवस्था ने पहले से मौजूद जनजातीय संस्थागत ढाँचे, जैसे — मुंडा-मानकी प्रणाली, का उपयोग किया और उसे राजनीतिक एजेंट के अधीन औपनिवेशिक ढाँचे में शामिल कर लिया।
इससे अंग्रेजों पर प्रत्यक्ष प्रशासनिक बोझ कम हुआ, लेकिन साथ ही यह जनजातीय नेताओं पर औपनिवेशिक नियंत्रण और हस्तक्षेप का माध्यम भी बन गया।
व्यवहारिक एवं संरचनात्मक कारक (Behavioural / Structural Factors)
यह नीति गहरे सामाजिक और व्यवहारिक कारणों की प्रतिक्रिया थी, जैसे —
- बाहरी शोषण के खिलाफ जनजातीय प्रतिरोध
- सामुदायिक भूमि स्वामित्व का कमजोर होना
- गैर-जनजातीय लोगों का बढ़ता प्रवेश
यद्यपि इस नीति ने भूमि हड़पने जैसी कुछ समस्याओं को सीमित करने का प्रयास किया, फिर भी यह औपनिवेशिक शक्ति संतुलन को मूल रूप से नहीं बदल सकी और न ही सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को समाप्त कर पाई।
आगे की दिशा (Way Forward)
विल्किंसन नियमों की विरासत यह दर्शाती है कि भारत में जनजातीय शासन और भूमि अधिकारों की चुनौतियाँ आज भी बनी हुई हैं। भविष्य में न्यायपूर्ण विकास और जनजातीय स्वायत्तता की रक्षा के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण आवश्यक है।
1. PESA Act, 1996 का प्रभावी क्रियान्वयन
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) को प्रभावी रूप से लागू करना आवश्यक है ताकि ग्राम सभाएँ स्थानीय संसाधनों का प्रबंधन और विवादों का समाधान स्वयं कर सकें। यह वास्तविक स्वशासन की भावना को मजबूत करेगा।
2. पारंपरिक शासन व्यवस्था का समन्वय
मुंडा-मानकी जैसी पारंपरिक जनजातीय संस्थाओं को आधुनिक कानूनी ढाँचे के साथ जोड़ा जाना चाहिए, ताकि उनकी उपयोगिता बनी रहे और संवैधानिक मूल्यों से भी समझौता न हो।
3. भूमि हड़पने की रोकथाम
जनजातीय क्षेत्रों में भूमि हस्तांतरण रोकने के लिए मजबूत कानूनी और प्रशासनिक तंत्र विकसित करना आवश्यक है। इसके लिए ऐतिहासिक कानूनों की सफलताओं और सीमाओं से सीख लेनी चाहिए।
4. सामाजिक-आर्थिक विकास
जनजातीय सांस्कृतिक संदर्भों को ध्यान में रखते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से संबंधित व्यापक विकास कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए, ताकि ऐतिहासिक असमानताओं को कम किया जा सके।
5. प्रथागत कानूनों का दस्तावेजीकरण
जनजातीय प्रथागत कानूनों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और संहिताकरण किया जाना चाहिए, जिससे उन्हें स्पष्ट कानूनी मान्यता मिल सके और कानूनी बहुलवाद (Legal Pluralism) को मजबूत किया जा सके।
ये कदम भारत के जनजातीय समुदायों के लिए अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण शासन व्यवस्था विकसित करने में सहायक हो सकते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न
- विल्किंसन नियमों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
- विल्किंसन नियम सामान्य ब्रिटिश प्रशासन से किस प्रकार भिन्न थे?
- इन नियमों के अंतर्गत मुंडा और मानकी की क्या भूमिका थी?
- क्या विल्किंसन नियमों ने छोटानागपुर में भूमि हड़पने को पूरी तरह रोक दिया था?
अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims MCQs)
निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो 1837 के विल्किंसन नियमों से संबंधित हैं:
- ये नियम मुख्य रूप से कोल्हान क्षेत्र के लिए बनाए गए थे, जहाँ हो जनजाति निवास करती थी।
- इन नियमों ने मुंडा-मानकी शासन व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर दिया था।
- इन नियमों में न्यायिक निगरानी के अंतर्गत जनजातीय भूमि को गैर-जनजातीय लोगों को बेचने की अनुमति दी गई थी।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
विल्किंसन नियम (1837) में निहित प्रशासनिक रणनीति को सबसे उचित रूप से किस प्रकार वर्णित किया जा सकता है?
(a) प्रत्यक्ष औपनिवेशिक विलय और समान कानूनी व्यवस्था लागू करना।
(b) अप्रत्यक्ष शासन की ऐसी व्यवस्था, जिसमें पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व और प्रथागत कानूनों को शामिल किया गया, लेकिन अंतिम नियंत्रण औपनिवेशिक शासन के अधीन रहा।
(c) प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियों को पूर्ण रूप से स्वायत्त जनजातीय परिषदों को सौंप देना।
(d) जनजातीय भूमि के प्रत्यक्ष ब्रिटिश प्रबंधन द्वारा केवल संसाधनों के दोहन पर ध्यान देना।
मुख्य परीक्षा प्रश्न (250 शब्द)
“1837 के विल्किंसन नियमों को यद्यपि छोटानागपुर की जनजातीय समुदायों के लिए एक सुरक्षात्मक व्यवस्था माना जाता है, लेकिन वास्तव में वे औपनिवेशिक शासन की शांति स्थापना और प्रशासनिक नियंत्रण की रणनीति थे।”
इस कथन का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए तथा जनजातीय भूमि अधिकारों और स्वशासन पर इन नियमों के अल्पकालिक उद्देश्यों एवं दीर्घकालिक प्रभावों की चर्चा कीजिए।
