झारखंड का भू-राजनीतिक विकास: सबाल्टर्न कथाएँ और राज्य निर्माण (प्राचीन काल से 2000 ई० तक)
झारखंड क्षेत्र का ऐतिहासिक विकास जातीय-क्षेत्रीय आत्मनिर्णय (Ethno-Regional Self-Determination) तथा विभिन्न प्रकार के प्रभुत्ववादी नियंत्रणों के विरुद्ध उपेक्षित समुदायों के निरंतर प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत करता है। संसाधनों से समृद्ध छोटानागपुर पठार में स्थित यह भौगोलिक क्षेत्र, जिसे प्रायः “झारखंड” (अर्थात् वन क्षेत्र) कहा जाता है, ऐतिहासिक रूप से एक सीमांत क्षेत्र (Frontier Region) रहा है। यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट जनजातीय सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं तथा बाहरी हस्तक्षेपों के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के लिए जाना जाता रहा है, चाहे वे साम्राज्यवादी शक्तियाँ हों या मुख्यधारा के प्रभुत्वशाली समुदाय।
सन् 2000 ई० में झारखंड राज्य का गठन केवल एक प्रशासनिक पुनर्गठन नहीं था, बल्कि यह सदियों से चल रहे आदिवासी समुदायों के राजनीतिक स्वायत्तता और भारतीय संघीय व्यवस्था के भीतर अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान की मान्यता के संघर्ष का परिणाम था।
यह लंबा संघर्ष, जो बार-बार होने वाले शोषण और तीव्र विद्रोहों से चिह्नित था, आदिवासी अधिकारों और राज्य-प्रेरित विकास मॉडल के बीच के तनाव को उजागर करता है। इसलिए झारखंड का इतिहास “आंतरिक उपनिवेशवाद” (Internal Colonialism) की अवधारणा को समझने में महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करता है, जहाँ क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों और श्रमशक्ति का उपयोग बाहरी शक्तियों के हित में किया गया, जबकि स्थानीय समुदायों को इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ा।
अतः झारखंड के इस जटिल ऐतिहासिक विकास को समझना राज्य की वर्तमान सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों तथा प्रशासनिक आवश्यकताओं को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
UPSC/JPSC में प्रासंगिकता (Relevance Snapshot)
GS-I (भारतीय इतिहास एवं संस्कृति)
प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक भारतीय इतिहास, विशेष रूप से जनजातीय आंदोलन, किसान विद्रोह तथा स्वतंत्रता के बाद का राष्ट्रीय एकीकरण।
GS-I (भारतीय समाज)
जनजातीय समुदाय, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान तथा हाशिए पर पड़े वर्गों की समस्याएँ।
GS-I (भूगोल)
संसाधनों का वितरण तथा उसका ऐतिहासिक विकास और क्षेत्रीय असमानताओं पर प्रभाव।
GS-II (राजव्यवस्था एवं शासन)
राज्य पुनर्गठन, संघवाद, सामाजिक-आर्थिक न्याय तथा जनजातीय प्रशासन।
GS-III (अर्थव्यवस्था)
संसाधन प्रबंधन, औद्योगीकरण तथा विस्थापन से संबंधित समस्याएँ।
निबंध (Essay)
क्षेत्रवाद, पहचान की राजनीति, सतत विकास तथा सामाजिक न्याय से जुड़े विषय।
प्राचीन एवं मध्यकालीन काल : निर्माणकारी युग और सापेक्ष स्वायत्तता
झारखंड क्षेत्र का प्राचीन इतिहास मुख्यतः इसकी उस रणनीतिक भौगोलिक स्थिति से जुड़ा है, जो इसे उत्तर भारत के बड़े साम्राज्यों की सीमाओं पर स्थित एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनाती थी। इस कारण यहाँ की जनजातीय समुदायों को राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वायत्तता का एक स्तर प्राप्त था।
पुरातात्विक प्रमाण, जैसे — मेगालिथ, लौह अवशेष (Iron Slag) तथा मिट्टी के बर्तन, जिन्हें इटखोरी (चतरा) और डालमी (धनबाद) जैसे स्थलों से प्राप्त किया गया है, यह दर्शाते हैं कि यहाँ मध्यपाषाण (Mesolithic) और ताम्रपाषाण (Chalcolithic) काल से मानव निवास तथा उन्नत धातुकर्म कला विद्यमान थी।
यद्यपि यह क्षेत्र मगध जैसे विस्तृत साम्राज्यों के प्रभाव में था, फिर भी घने जंगलों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों ने जनजातीय राज्यों को प्रत्यक्ष रूप से बाहरी सत्ता में विलय होने से काफी हद तक बचाए रखा। इससे मुंडा-मानकी और परहा जैसी विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाओं का विकास हुआ।
मध्यकालीन काल में दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य के साथ संपर्क बढ़ा, जिसके कारण प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित करने तथा कर संबंधी व्यवस्थाएँ लागू करने के प्रयास हुए। इसके बावजूद नागवंशी और चेरो जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय राजवंशों ने अपने क्षेत्रों पर पर्याप्त नियंत्रण बनाए रखा। उन्होंने साम्राज्यवादी दबावों और स्थानीय परंपराओं के बीच संतुलन बनाते हुए शासन किया।
मध्यकालीन ग्रंथों में भी इस क्षेत्र को “झारखंड” कहा गया है। इसी काल में व्यापार, जैन धर्म और बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, जिसके प्रमाण पारसनाथ पहाड़ी और इटखोरी जैसे स्थानों में मिलते हैं।
प्रमुख राजवंश एवं प्रारंभिक संपर्क
प्री-मौर्य काल (Pre-Mauryan Era)
- लौह युगीन बस्तियों के प्रमाण मिलते हैं।
- प्रारंभिक जनजातीय समुदाय — मुंडा, उरांव और हो जनजातियाँ।
मगध का प्रभाव (Magadhan Influence)
- अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया गया।
- हाथी और लौह जैसे संसाधनों के लिए यह क्षेत्र महत्वपूर्ण था।
- झारखंड क्षेत्र साम्राज्यों को सैनिक और संसाधन उपलब्ध कराता था।
नागवंशी राजवंश (लगभग पहली शताब्दी ई० से)
यह छोटानागपुर का सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला स्वदेशी राजवंश था।
संस्थापक
- फणी मुकुट राय (पौराणिक/किंवदंती आधारित संस्थापक)
राजधानी
- प्रारंभ में सुतियाम्बे
- बाद में चुटिया
- फिर दोइसा (नवरत्नगढ़)
महत्व
- जनजातीय परंपराओं को बनाए रखते हुए हिंदू शासन पद्धति के कुछ तत्व अपनाए।
- मंदिरों और किलों का निर्माण कराया, जैसे — जगन्नाथपुर मंदिर।
चेरो राजवंश (लगभग 16वीं–18वीं शताब्दी)
यह राजवंश मुख्य रूप से पलामू क्षेत्र में शक्तिशाली था।
प्रमुख शासक
- मेदिनी राय — जिन्हें “न्यायी राजा” कहा जाता था।
उपलब्धियाँ
- पलामू किलों का निर्माण।
- राज्य का विस्तार।
- मुगलों के आक्रमणों का विरोध।
सल्तनत एवं मुगल काल
दिल्ली सल्तनत
- अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित किया गया।
- तुगलक कालीन ग्रंथों में “झारखंड” का उल्लेख मिलता है।
मुगल साम्राज्य
- अकबर, जहाँगीर और औरंगजेब के समय कई सैन्य अभियान चलाए गए।
प्रमुख घटनाएँ
- नागवंशी राजा दुर्जन साल ने कर देने से इनकार किया, जिसके कारण जहाँगीर ने उन्हें बंदी बना लिया।
- बाद में उन्हें रिहा कर “शाह” की उपाधि दी गई।
प्रशासनिक व्यवस्था
- झारखंड के कुछ हिस्से बिहार सूबा के अंतर्गत रखे गए।
- आंतरिक जनजातीय क्षेत्रों ने काफी हद तक अपनी स्वायत्तता बनाए रखी।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव
जैन धर्म
- पारसनाथ पहाड़ी (शिखरजी) जैन तीर्थंकरों का प्रमुख तीर्थ स्थल बना।
बौद्ध धर्म
- इटखोरी और डालमी में बौद्ध धर्म के प्रारंभिक प्रभाव के प्रमाण मिलते हैं।
औपनिवेशिक काल : संसाधनों का दोहन और संगठित प्रतिरोध
18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन ने झारखंड क्षेत्र में सीमित संपर्क से व्यवस्थित औपनिवेशिक हस्तक्षेप और शोषण की दिशा में एक बड़ा परिवर्तन उत्पन्न किया। अंग्रेजों ने 1771 में पलामू क्षेत्र के माध्यम से प्रवेश किया और उनका मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र के विशाल खनिज संसाधनों का दोहन तथा उपजाऊ भूमि पर राजस्व नियंत्रण स्थापित करना था।
यह काल “आंतरिक उपनिवेशवाद” (Internal Colonialism) के युग के रूप में उभरा, जिसमें जनजातीय भूमि व्यवस्था, जैसे — खूँटकट्टी प्रणाली, को स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement, 1793) और ‘दिकुओं’ (बाहरी लोग — महाजन, व्यापारी, जमींदार) के प्रवेश द्वारा कमजोर या समाप्त कर दिया गया।
इस आर्थिक और सांस्कृतिक विघटन के कारण अनेक शक्तिशाली जनजातीय विद्रोह हुए, जिनमें मसीहाई नेतृत्व तथा अंग्रेजों और दिकुओं के विरुद्ध तीव्र भावना दिखाई देती है। ये विद्रोह अंग्रेजों के लिए केवल कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं थे, बल्कि उपेक्षित समुदायों द्वारा अपनी पारंपरिक जीवन शैली और खोई हुई स्वायत्तता को पुनः प्राप्त करने का प्रयास थे।
यद्यपि अंग्रेजों की प्रतिक्रिया प्रायः कठोर और दमनकारी थी, फिर भी इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप विशेष कानूनों और प्रशासनिक इकाइयों का निर्माण किया गया, जिससे यह स्वीकार किया गया कि जनजातीय क्षेत्रों की प्रकृति अलग और विशिष्ट थी।
ब्रिटिश प्रशासनिक हस्तक्षेप और शोषण
प्रारंभिक प्रवेश (1765-1771)
- अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई।
- 1771 में पलामू के माध्यम से छोटानागपुर क्षेत्र में धीरे-धीरे प्रवेश शुरू हुआ।
जमींदारी व्यवस्था की शुरुआत
- पारंपरिक सामुदायिक भूमि व्यवस्था बाधित हुई।
- जनजातीय लोगों की भूमि बाहरी लोगों के हाथों में जाने लगी।
वन अधिनियम (1865, 1878)
- जंगलों और वन उत्पादों पर जनजातीय अधिकार सीमित कर दिए गए।
- इससे उनकी आजीविका और सांस्कृतिक जीवन प्रभावित हुआ।
प्रशासनिक विभाजन
- जनजातीय क्षेत्रों के अलग प्रबंधन के लिए “नॉन-रेगुलेशन प्रांत” तथा “दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी” (1833) बनाई गई।
- यह व्यवस्था कोल विद्रोह के बाद लागू की गई।
प्रमुख जनजातीय विद्रोह (उलगुलान)
चुआर विद्रोह (1771-1809)
- नेतृत्व: जगन्नाथ ढाल, दुल्हन सिंह आदि।
- क्षेत्र: जंगल महल।
तमाड़ विद्रोह (1789-1832)
- उरांव, मुंडा और कोल समुदायों द्वारा जमींदारों और अंग्रेजों के खिलाफ कई विद्रोह।
कोल विद्रोह (1831-32)
- मुंडा, उरांव और हो जनजातियों का व्यापक विद्रोह।
- कारण: भूमि छिनना और दिकुओं का शोषण।
परिणाम
- दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी का गठन।
- बाद में छोटानागपुर डिवीजन बनाया गया और विशेष नियम लागू किए गए।
संथाल हूल (1855-56)
- नेतृत्व: सिदो और कान्हू मुर्मू।
- विरोध: जमींदारों, महाजनों और अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ।
महत्व
- यह अत्यंत संगठित और शक्तिशाली जनजातीय विद्रोह था।
परिणाम
- संथाल परगना जिला बनाया गया।
- संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (SPT Act), 1876 लागू हुआ, जिसने जनजातीय भूमि अधिकारों को मान्यता दी।
सरदारी लड़ाई / मुलकुई लड़ाई (1858-1895)
- मुंडा और उरांव सरदारों द्वारा अपने पैतृक भूमि अधिकार वापस पाने के लिए लंबा आंदोलन।
बिरसा मुंडा का उलगुलान (1895-1900)
- बिरसा मुंडा के नेतृत्व में “महान उथल-पुथल”।
- उद्देश्य: स्वशासन (मुंडा राज), भूमि अधिकार और सांस्कृतिक पुनर्जागरण।
महत्व
- धार्मिक और राजनीतिक उद्देश्यों का मिश्रण।
- इस आंदोलन ने जनजातीय चेतना पर गहरा प्रभाव डाला।
परिणाम
- छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (CNT Act), 1908 लागू हुआ, जिसने जनजातीय भूमि को बाहरी लोगों के हाथों जाने से सुरक्षा प्रदान की।
पृथक राज्य की मांग की उत्पत्ति : सांस्कृतिक पहचान से राजनीतिक आंदोलन तक
औपनिवेशिक शासन के दौरान हुए सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन, लगातार शोषण के अनुभव तथा लंबे समय तक चले प्रतिरोध आंदोलनों ने झारखंड क्षेत्र के लिए एक अलग प्रशासनिक और राजनीतिक इकाई की मांग की नींव रखी।
20वीं शताब्दी के प्रारंभिक आंदोलनों पर ईसाई मिशनरियों का भी प्रभाव था, जिन्होंने शिक्षा और संगठन के माध्यम से जनजातीय समाज को जागरूक किया। प्रारंभ में ये आंदोलन सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक उत्थान पर केंद्रित थे, लेकिन धीरे-धीरे ये राजनीतिक स्वायत्तता की मांग में बदल गए। यह मांग जनजातीय विरासत पर आधारित साझा पहचान और सामूहिक उपेक्षा की भावना से प्रेरित थी।
स्वतंत्रता के बाद पृथक झारखंड राज्य की मांग और अधिक मजबूत हो गई। यह केवल सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन न रहकर पूर्ण राजनीतिक आंदोलन बन गया। यद्यपि राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) ने 1955 में भाषाई विविधता और आर्थिक अस्थिरता का हवाला देते हुए इस मांग को अस्वीकार कर दिया, फिर भी स्वशासन की भावना और अधिक प्रबल हुई। परिणामस्वरूप लगातार राजनीतिक आंदोलन और क्षेत्रीय दलों का गठन हुआ।
20वीं शताब्दी के प्रारंभिक आंदोलन एवं प्रमुख व्यक्तित्व
छोटानागपुर उन्नति समाज (1915)
यह पहला बड़ा संगठित जनजातीय सामाजिक-राजनीतिक संगठन था।
प्रमुख नेता
- जोएल लकड़ा
- बंदी उरांव
- पॉल दयाल
उद्देश्य
- सामाजिक एवं आर्थिक उत्थान
- जनजातीय पहचान की रक्षा
- छोटानागपुर के लिए अलग प्रशासनिक इकाई की मांग
किसान सभा (1930)
- नेतृत्व: थेबले उरांव
- मुख्य मुद्दे: किसानों की समस्याएँ और भूमि अधिकार
छोटानागपुर कैथोलिक सभा (1933)
- कैथोलिक आदिवासियों के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य किया।
आदिवासी महासभा (1939)
यह विभिन्न जनजातीय संगठनों को मिलाकर बनाई गई थी।
प्रमुख नेता
- जयपाल सिंह मुंडा
(प्रसिद्ध हॉकी ओलंपियन एवं राजनीतिक नेता)
उद्देश्य
- पृथक झारखंड राज्य की स्पष्ट मांग।
- संविधान सभा में आदिवासी मुद्दों को उठाना।
झारखंड पार्टी (1950)
- स्थापना: जयपाल सिंह मुंडा द्वारा।
- यह झारखंड क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति बन गई।
राजनीतिक सफलता
- 1952 और 1957 के आम चुनावों में जनजातीय क्षेत्रों में बड़ी सफलता प्राप्त की।
राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC), 1955
सिफारिश
आयोग ने झारखंड राज्य की मांग को अस्वीकार कर दिया।
मुख्य कारण
- क्षेत्र में एक समान भाषा का अभाव (बहुभाषी क्षेत्र)।
- आर्थिक रूप से राज्य को अव्यवहारिक माना गया।
प्रभाव
- लोगों में असंतोष बढ़ा।
- पृथक राज्य आंदोलन और अधिक मजबूत हो गया।
झारखंड क्षेत्र का प्रशासनिक विकास : तुलनात्मक दृष्टिकोण
झारखंड क्षेत्र की प्रशासनिक स्थिति समय-समय पर बदलती रही, जो सत्ता संतुलन, संसाधनों पर नियंत्रण तथा स्थानीय जनजातीय समुदायों की बदलती मांगों को दर्शाती है।
इन परिवर्तनों का तुलनात्मक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि स्थानीय स्वायत्तता की मांग और केंद्रीकृत शक्तियों के बीच संघर्ष लगातार बना रहा।
| विशेषता | ब्रिटिश शासन से पूर्व जनजातीय स्वायत्तता (जैसे नागवंशी, चेरो राज्य) | ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन (1771-1947) | स्वतंत्रता के बाद बिहार राज्य (1947-2000) |
|---|---|---|---|
| प्रशासनिक संरचना | विकेन्द्रीकृत जनजातीय शासन व्यवस्था (मुंडा-मानकी, परहा प्रणाली), कर-आधारित क्षेत्रीय राज्य। | अत्यधिक केंद्रीकृत शासन; कमिश्नर/डिप्टी कमिश्नर के माध्यम से प्रत्यक्ष नियंत्रण; “नॉन-रेगुलेशन प्रांत” एवं “दक्षिण-पश्चिम सीमांत एजेंसी” का गठन। | बिहार राज्य प्रशासन में एकीकृत; जिले और अनुमंडल राज्य सरकार के नियंत्रण में। |
| भूमि व्यवस्था | सामुदायिक भूमि स्वामित्व (खूँटकट्टी, भूइंहरी), प्रथागत कानून। | जमींदारी और स्थायी बंदोबस्त लागू; भूमि हड़पना; बाद में CNT Act और SPT Act जैसे सुरक्षात्मक कानून। | औपनिवेशिक काल के भूमि कानून जारी रहे; भूमि सुधार के प्रयास; भूमि हड़पने की समस्या बनी रही। |
| संसाधनों पर नियंत्रण | जंगल और खनिज संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण; निर्वाह आधारित अर्थव्यवस्था। | साम्राज्यवादी हितों के लिए खनिज (कोयला, लौह) और वन संसाधनों का व्यवस्थित शोषण; राज्य का नियंत्रण स्थापित। | प्रमुख खनिज संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण; केंद्र के साथ राजस्व साझेदारी; स्थानीय लोगों को सीमित लाभ। |
| राजनीतिक स्वायत्तता | पर्याप्त स्थानीय स्वायत्तता; बाहरी हस्तक्षेप सीमित। | न्यूनतम स्वायत्तता; जनजातीय परिषदों को कमजोर किया गया; लगातार प्रतिरोध आंदोलन। | सीमित क्षेत्रीय स्वायत्तता; पटना से प्रशासन; जनजातीय मुद्दों की उपेक्षा की भावना। |
| न्यायिक व्यवस्था | प्रथागत जनजातीय न्याय प्रणाली। | ब्रिटिश कानून लागू; न्यायालयों की स्थापना; विशेष जनजातीय नियम (जैसे छोटानागपुर न्याय प्रशासन नियम)। | भारतीय न्यायिक प्रणाली में एकीकरण; पटना उच्च न्यायालय तथा जिला स्तरीय अधीनस्थ न्यायालय। |
लगातार आंदोलन के दशक : 1970 से 1990 का काल
राज्य पुनर्गठन आयोग (SRC) द्वारा पृथक राज्य की मांग अस्वीकार किए जाने तथा बिहार सरकारों द्वारा क्षेत्र के विकास की उपेक्षा किए जाने की भावना ने 1970 के दशक से झारखंड आंदोलन को नया और अधिक आक्रामक रूप दिया।
इस काल में नए नेतृत्व और संगठनों का उदय हुआ, जिन्होंने बिखरे हुए जनजातीय और गैर-जनजातीय समूहों को क्षेत्रीय पहचान और आर्थिक उपेक्षा के साझा मुद्दे पर एकजुट किया।
यह आंदोलन चुनावी राजनीति, जन आंदोलनों और एक अलग क्षेत्रीय विकास मॉडल की मांग के माध्यम से मजबूत हुआ। 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) का गठन इस आंदोलन का महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इसने विभिन्न समूहों को एक मंच पर लाकर आंदोलन को निरंतर राजनीतिक दिशा प्रदान की।
यद्यपि आंदोलन को आंतरिक मतभेदों और रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, फिर भी इसके लगातार दबाव के कारण भारतीय राज्य को झारखंड क्षेत्र की अलग पहचान और आकांक्षाओं को स्वीकार करना पड़ा।
अंततः राज्य गठन से पहले एक अर्ध-स्वायत्त निकाय (Semi-Autonomous Body) की स्थापना की गई, जो संघीय ढाँचे के भीतर जातीय-क्षेत्रीय मांगों को स्वीकार करने की दिशा में नीतिगत परिवर्तन का संकेत था।
प्रमुख संगठन एवं महत्वपूर्ण पड़ाव
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) (1972)
इस संगठन की स्थापना शिबू सोरेन (राजनीतिक नेता), बिनोद बिहारी महतो (सामाजिक सुधारक) तथा ए.के. राय (मार्क्सवादी ट्रेड यूनियन नेता) द्वारा की गई।
विचारधारा
- जनजातीय स्वशासन
- दिकुओं के विरुद्ध संघर्ष
- श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा
रणनीति
- प्रत्यक्ष आंदोलन
- नाकाबंदी और विरोध प्रदर्शन
- चुनावी राजनीति में भागीदारी
ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (AJSU) (1986)
यह संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) के मॉडल पर बनाया गया था। प्रारंभिक दौर में इसने अधिक उग्र रणनीतियाँ अपनाईं।
झारखंड समन्वय समिति (JCC) (1987)
- इस संगठन ने राज्य गठन की मांग करने वाले 50 से अधिक संगठनों को एक मंच पर लाया।
- राष्ट्रपति को संयुक्त ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।
झारखंड क्षेत्र स्वायत्त परिषद (JAAC) (1995)
गठन
लंबे आंदोलन और वार्ताओं के बाद बिहार सरकार ने इसकी स्थापना को स्वीकार किया।
संरचना
- यह एक अर्ध-स्वायत्त निकाय था।
- दक्षिण बिहार के 18 जिलों पर प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार दिए गए।
महत्व
- यह आंदोलन की बड़ी राजनीतिक सफलता थी।
- इससे क्षेत्र की अलग प्रशासनिक आवश्यकताओं को मान्यता मिली।
- यह पूर्ण राज्य गठन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
बिहार पुनर्गठन विधेयक, 2000
संसद द्वारा पारित इस विधेयक के माध्यम से झारखंड राज्य के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
झारखंड राज्य का गठन (15 नवंबर, 2000)
- बिरसा मुंडा की जयंती के दिन झारखंड राज्य का गठन हुआ।
- यह लगभग एक शताब्दी लंबे संघर्ष का परिणाम था।
आलोचनात्मक मूल्यांकन : अधूरी आकांक्षाएँ और विवादित कथाएँ
15 नवंबर 2000 को झारखंड राज्य का गठन क्षेत्रीय आत्मनिर्णय की मांग करने वाले उपेक्षित आंदोलनों की एक महत्वपूर्ण जीत थी।
हालाँकि, आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो राज्य गठन केवल एक राजनीतिक मांग की पूर्ति थी; इससे वे गहरी समस्याएँ स्वतः समाप्त नहीं हुईं जिन्होंने इस आंदोलन को जन्म दिया था। इनमें प्रमुख थीं —
- आदिवासी समुदायों का सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन
- प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण
राज्य गठन के बाद की स्थिति को अक्सर “संघर्ष की निरंतरता” के रूप में देखा जाता है, केवल प्रशासनिक ढाँचा बदल गया। भूमि संरक्षण, पर्यावरणीय न्याय और वास्तविक आदिवासी सशक्तिकरण जैसे मूल उद्देश्य अभी भी पूरी तरह पूरे नहीं हो सके हैं।
आज भी शासन व्यवस्था, संसाधन प्रबंधन और सामाजिक समावेशन से जुड़ी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। आलोचकों का मानना है कि विकास का लाभ समाज के सबसे कमजोर वर्गों तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुँच पाया है। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या नई राजनीतिक नेतृत्व व्यवस्था वास्तव में उन उपेक्षित समुदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है, जिनके संघर्ष से राज्य का निर्माण हुआ।
भूमि हड़पने की घटनाएँ आज भी जारी हैं और व्यापक खनन गतिविधियों से होने वाला पर्यावरणीय नुकसान स्थानीय समुदायों को मिलने वाले आर्थिक लाभ से अधिक दिखाई देता है। इससे यह संकेत मिलता है कि राजनीतिक स्वायत्तता मिलने के बाद भी “आंतरिक उपनिवेशवाद” जैसी प्रवृत्तियाँ किसी न किसी रूप में बनी हुई हैं।
राज्य गठन के बाद भी बनी रहने वाली चुनौतियाँ
भूमि हड़पना और विस्थापन
CNT Act और SPT Act जैसे सुरक्षात्मक कानूनों के बावजूद विभिन्न माध्यमों — जैसे विकास परियोजनाएँ और धोखाधड़ीपूर्ण भूमि बिक्री — के द्वारा आदिवासी भूमि का हस्तांतरण आज भी जारी है।
संसाधन अभिशाप (Resource Curse)
प्रचुर खनिज संपदा होने के बावजूद राज्य में व्यापक समृद्धि नहीं आ सकी। इसके बजाय खनन गतिविधियों ने संघर्ष, पर्यावरणीय क्षति और लाभों के असमान वितरण को बढ़ावा दिया।
सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ
झारखंड में गरीबी, कुपोषण तथा मानव विकास से संबंधित समस्याएँ अभी भी गंभीर हैं। विशेष रूप से जनजातीय समुदायों में NFHS-5 के अनुसार बच्चों में ठिगनापन (Stunting) और दुबलापन (Wasting) की दर अधिक है।
शासन व्यवस्था और भ्रष्टाचार
संसाधनों के आवंटन और विकास परियोजनाओं में भ्रष्टाचार तथा प्रभावशाली समूहों के नियंत्रण (Regulatory Capture) के आरोप सार्वजनिक विश्वास को कमजोर करते हैं।
पहचान का संकट
गैर-जनजातीय आबादी के बढ़ते आगमन और औद्योगीकरण के कारण आदिवासी भाषाओं, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के सामने चुनौतियाँ उत्पन्न हो रही हैं।
नक्सली उग्रवाद
राज्य के कई क्षेत्रों में नक्सली गतिविधियाँ अभी भी जारी हैं, जिनकी जड़ें भूमि, विकास और प्रशासनिक असफलताओं से जुड़ी शिकायतों में हैं।
संरचित मूल्यांकन (Structured Assessment)
प्राचीन स्वायत्त क्षेत्रों से आधुनिक झारखंड राज्य तक की यात्रा यह समझने का महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करती है कि राज्य गठन न्याय और विकास के साधन के रूप में कितना प्रभावी रहा है।
1. नीतिगत पर्याप्तता (Policy Design Adequacy)
झारखंड राज्य का गठन तथा उससे पहले JAAC की स्थापना ने क्षेत्र की राजनीतिक विशिष्टता को स्वीकार किया।
हालाँकि, बाद की नीतियाँ आदिवासी भूमि अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा तथा संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करने में पूरी तरह सफल नहीं हो सकीं। इससे राजनीतिक उद्देश्य और जमीनी क्रियान्वयन के बीच अंतर दिखाई देता है।
2. शासन एवं संस्थागत क्षमता (Governance / Institutional Capacity)
यद्यपि राज्य के पास अपना प्रशासनिक ढाँचा है, फिर भी प्रभावी और पारदर्शी शासन की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमजोरी तथा संस्थागत समस्याओं के कारण सामाजिक-आर्थिक न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।
ऐतिहासिक उपेक्षा की विरासत आज भी प्रशासनिक चुनौतियों के साथ जुड़ी हुई दिखाई देती है।
3. व्यवहारिक एवं संरचनात्मक कारक (Behavioural / Structural Factors)
गहरी सामाजिक और संरचनात्मक असमानताएँ, विशेष रूप से आदिवासी समुदायों और बाहरी आर्थिक शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन, राज्य के विकास को प्रभावित करते हैं।
इतिहास से जुड़ी शोषणकारी प्रवृत्तियाँ तथा नीतिगत बदलावों के प्रति प्रतिरोध यह दर्शाते हैं कि अतीत और वर्तमान चुनौतियाँ आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न
- झारखंड राज्य आंदोलन के पीछे मुख्य सामाजिक-आर्थिक कारण क्या थे?
- ब्रिटिश प्रशासनिक नीतियों ने झारखंड क्षेत्र में जनजातीय भूमि अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित किया?
- छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट (CNT Act) और संथाल परगना टेनेंसी एक्ट (SPT Act) का क्या महत्व था?
- राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) ने पृथक झारखंड राज्य की मांग को किस दृष्टि से देखा?
- राज्य गठन की मांग में आर्थिक कारणों के साथ सांस्कृतिक पहचान की क्या भूमिका थी?
परीक्षा में उपयोग (Exam Integration)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims MCQs)
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
झारखंड क्षेत्र के जनजातीय आंदोलनों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- कोल विद्रोह (1831-32) मुख्य रूप से स्थायी बंदोबस्त और भूमि हड़पने के कारण उत्पन्न हुआ।
- बिरसा मुंडा के उलगुलान आंदोलन का उद्देश्य “मुंडा राज” की स्थापना करना था तथा इसने अंग्रेजों और दिकुओं दोनों को चुनौती दी।
- संथाल हूल (1855-56) के परिणामस्वरूप संथाल परगना जिला तथा विशेष टेनेंसी कानून बनाए गए।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल I और II
(b) केवल II और III
(c) केवल I और III
(d) I, II और III
उत्तर: (d)
तीनों कथन सही हैं। कोल विद्रोह भूमि हड़पने के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण आंदोलन था। बिरसा मुंडा का आंदोलन स्वशासन की मांग और बाहरी प्रभावों के विरोध पर आधारित था। संथाल हूल के परिणामस्वरूप संथाल परगना जिला तथा सुरक्षात्मक भूमि कानून लागू किए गए।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
स्वतंत्रता से पहले पृथक झारखंड राज्य की मांग को सबसे स्पष्ट रूप से निम्नलिखित में से किस संगठन ने प्रस्तुत किया था?
(a) छोटानागपुर उन्नति समाज
(b) किसान सभा
(c) आदिवासी महासभा
(d) झारखंड पार्टी
उत्तर: (c)
यद्यपि छोटानागपुर उन्नति समाज ने अलग प्रशासनिक इकाई की अवधारणा प्रस्तुत की थी, लेकिन 1939 में जयपाल सिंह मुंडा के नेतृत्व में आदिवासी महासभा ने स्पष्ट रूप से पृथक झारखंड राज्य की मांग उठाई। झारखंड पार्टी का गठन स्वतंत्रता के बाद 1950 में हुआ था।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
झारखंड राज्य के 2000 में गठन ने वहाँ की जनजातीय आबादी की ऐतिहासिक शिकायतों और आकांक्षाओं को किस सीमा तक पूरा किया है? विशेष रूप से भूमि अधिकार, संसाधनों पर नियंत्रण तथा सामाजिक-आर्थिक विकास के संदर्भ में आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
250 शब्द
15 अंक
